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Thursday , 17 August 2017
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आजादी का उपहास

                                                 Media_Camera                                                                                       

                              मीडिया की स्वतंत्रता बनाम मर्यादा

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (अ) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लेख किया गया हैं। इस अनुच्छेद को भारतीय संविधान के प्रमुख एवं प्रभावशाली अनुच्छेदों में से एक बताया गया हैंए जिसका सीधा सरोकार आम देशवासी के मूल अधिकारों की स्वतंत्रता से है। इस अनुच्छेद के द्वारा यह बताने का प्रयास किया गया है कि भारतीय लोकतंत्र में आम भारतीय नागरिक को अपनी बात को दूसरो के समक्ष रखने एवं व्यक्त करने का मूल अधिकार हैं। इस अनुच्छेद कें द्वारा दिये गए अधिेकार सही मायनों में हम भारतीयों के लिए गर्व की बात हैंए क्योंकि भारत के अलावा दुनिया में ऐसे देशों की संख्या काफी कम है जिन्होंने अपने नागरिकों को इतनी अधिक स्वतंत्रता दे रखी हों।

भारतीय मीडिया भी इसी अनुच्छेद के अंतर्गत ही अपने सभी कार्यों को अंजाम देता हैं मीडिया की आजादी एवं उसकी स्वतत्रंता के नाम पर जो स्वतंत्रता पत्रकार और मीडिया को है हालाँकी मीडिया की अभिव्यक्ति का दायरा और प्रभाव आमलोगों से अधिक माना जाता है। किन्तु वर्तमान युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भारतीय मीडिया में जमकर इस कानून का दुरूप्रयोग हो रहा हैं बात भले पित पत्रकारिता की हो या फिर पेड न्यूज की या फिर इन्फोटेन्मेंट के नाम पर आये दिन खुल रहें नयें-नयें चैनलों की व टीआरपी के नाम पर चल रहें फूहड़ता भरे कार्यक्रमों के पीछे आज भारतीय मीडिया घरानों का एकमात्र लक्ष्य कॅार्पाेरेट कम्पनीयों की तर्ज पर अधिक से अधिक लाभ बटोरना मात्र हैं। इससे उनका कोई सरोकार नहीं कि ख़बरों के बाजार में आज ख़बरों के साथ किस तरह समझौता हो रहें हैं या फिर बाजार में उनके द्वारा दी गई किसी ख़बर या मनोरंजन के कार्यक्रम को पाठक या उनके दर्शक कैसे लेते हैं एवं समाज पर उसका क्या प्रभाव पड़ता।

इसी का परिणाम हैं कि आज मीडिया घरानों के संपादकीय विभाग छोटे होते जा रहें हैं एवं विज्ञापन विभाग उससे कहीं ज्यादा बड़े होते जा रहें है मीडिया घरानो में आज पत्रकार कम एवं एमबीए मार्केटिंग प्रोफेशनल ज्यादा नजर आते हैं जो अपने अख्रबारों को विभिन्नं-विभन्न स्कीमों, लाटरी एवं  लक्की ड्रा  कूपन के द्वारा चलाने में ज्यादा विश्वास करते हैं आजकल ज्यादातर मीडियाकर्मी येल्लो जर्नलिज्म एवं मीडिया में तेजी से पांव पसारतें बाजारवाद के कारण निष्पक्ष पत्रकारिता की गिरती साख के प्रति चिंतित या तत्पर नहीं दिखतें एवं जब कुछ पत्रकारों एवं बुद्धिजीवीयों ने इसके विरूद्व बोलना शुरू किया तो उन्हें कुंठित रूढ़िवादी असंतुष्ट एवं असफल पत्रकारों और जानकारों की टोली बता कर पल्ला झाड़ने का प्रयास किया जाने लगा हैं। किन्तु इसका उतर देने से आखिर क्यों सभी बचते रहतें हैं कि सभी की आलोचना करने वाला मीडिया सदैव स्वयं की आलोचना से मुहँ क्यों मोड़ लेता हैं?  क्यों उसका व्यवहार दो मुहँ वाले सांप जैसा  होता जा रहा हैं ? जो अच्छे और बुरे के बीच के अंतर को एवं उसकी मर्यादित सीमाओं को जानते हुए भी समाज के आईने को कलंकित करने पर उतारू हैं हालांकि किसी से भी मात्र अच्छाई की अपेक्षा करना भी बेमानी होगा है किन्तु क्या मीडिया को इस गलाकाट व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा की दौड़ में भेड़ चाल से बचने का प्रयास भी नहीं करना चाहिए? जिसका ये हमेंशा दम भरतें रहतें हैं।

पत्रकारिता के नाम पर बढ़ती बिकाऊ एवं बेशर्म रिर्पाटिंग का एक नमूना पिछलें दिनों गोवा में समुद्र तट पर अपनी पत्नी के संग निजी पल बिता रहें भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंन्द्र सिंह धोनी एवं उनकी पत्नी साक्षी के विडियों एवं तस्वीरों के मीडिया में आने से मिला। शायद ही किसी मीडिया घराने ने इसे हेड लाइन्स के रूप में प्रसारित या प्रकाशित ना किया हों। जैसे उनके लिए यह खबर एक राष्ट्रिय गौरव का विषय हो एवं जिसका लोगों तक पहुँचाना एक अनिवार्य आवश्यकता थी। या फिर भारतीय मीडिया का खबर अपने दर्शको तक पहुँचाने की कटिबद्धता का एक्सक्लूसिव प्रमाण। देश के हर प्रसिद्ध व्यक्ति के विवाह से लेकर उनके हनीमून एवं पत्नी के गर्भवती होने की रिर्पोटिंग अब ब्रेकिंग न्यूज का अहम हिस्सा बनता जा रहा हैं मानों आधुनिक खोजी पत्रकारिता का यह कोई नया आयाम हों।

देश में आये दिन खाने-पीने की चीजों में बढ़ रही मिलावट एवं नकली खादय सामग्री के प्रयोग की ख़बरें मीडिया में काफी जोर शोर से दिखाई जाती है जिसके लिए भारतीय दडं संहिता में दंड का प्रावधान भी हैं, किन्तु मीडिया के लिए ऐसा कोई प्रावधान दिखाई नहीं पड़ता। जो इसमें बढ़ रही मिलावट को रोक पायें। खबरों में बढ़ रहीं मिलावट को कोई भी रोकने या बात करने को तैयार नही दिखताए ख़बरों की ख़बर लेने की जिम्मेदारी तय होना भी आज की एक अनिवार्य एक आवश्यकता हैं अन्यथा निकट भविष्य में ये अपना विश्वास खोने में तनिक भी समय नहीं लगायेगी जैसा अमेरिका के मीडिया में कुछ वर्ष पूर्व हुआ। वर्ष 1975 में हुए एक मीडिया सर्वे के अनुसार 1975 में 86प्रतिशत अमेरिकी नागरिक अपने मीडिया पर विश्वास करते थे यह आंकड़ा वर्ष 2000 में सिमट कर मात्र 25 प्रतिशत रह गया एवं इसमें लगातार गिरावट जारी हैं भारतीय मीडिया को इससे बचने का एवं सीख लेने का प्रयास करना चाहिए।

एक मीडिया ग्रुप द्वारा बनाया गया एक विज्ञापन जिसमें एक महिला से एक पत्रकार द्वारा उसके पति की नकली दवाई के सेवन से मृत्यु पर ये पूछना कि आप को कैसा लग रहा हैं? पत्रकारिता कम एवं चटुकारिता अधिक नजर आती हैं एवं बाद में उस पत्रकार के सिर पर पड़ने वाली मार जिसमें इटस टाईम टू डू गुड जर्नलिज्म का संदेश संकेत हैं पत्रकारिता में तकनीकी परिवर्तन के बाद अब नैतिक परिवर्तन की आवश्यकता का जो पत्रकारिता के धर्म एवं इसके मुल्यों को नष्ट होने से बचा सके।

वर्तमान समय में इससें भी भयावह स्थिति मनोरंजन एवं रियल्टी शो के नाम पर चल रहें टी वी कार्यक्रमों की हैं। जिसमें रियल्टी के नाम बेशर्मी, अभद्र भाषाए दोहरे अर्थ वाले संवाद एवं फूहड़ता को इस प्रकार वर्तमान सत्य के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा जैसे भारतीय समाज का अंतिम सत्य यहीं हों। कौन सा चैनल या कार्यक्रम सबसे अधिक बेशर्मी एवं अशलीलता के साथ अपने द्वारा तैयार की गई सामग्री को परोसने में सफल हो सकता हैं इसकी एक अन्धी दौड़ पूरे भारतीय मीडिया में मनोरंजन के नाम में हो रहीं हैं इन परिघटनाओं का छिट-पुट विरोध तो अवश्य हुआ किन्तु ऐसे कार्यक्रमों के निर्माताए-निर्देशक एवं कलाकारों इत्यादि द्वारा यह सफाई देने के बाद मामला ठंडा पड़ जाता हैं की हम तो वही दिखाते हैं जो समाज में हो रहा हैं मानों देश को सत्य से परिचित कराने एवं समाज में पुनः रामराज स्थपित करने का ठेका इन्हीं कार्यक्रमों ने लिया हो। या फिर ऐसी बेशर्मी के अलावा कोई और विकल्प बचा ही ना हों। पिछले दिनों ऐसे ही एक कार्यक्रम का हिस्सा बनने के बाद झाँसी के एक युवक ने खुदकुशी कर ली जिसका आरोप भी एक रियल्टी शो पर ही गया हैं हो सकता है। कि किन्हीं तकनीकी कारणों से उस कार्यक्रम पर लगे आरोपं सिद्ध ना हो पायें किन्तु क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृति की सम्भावनाओं से इंकार किया जा सकता है ? शायद नहीं ऐसे कार्यक्रमों में दर्शकदीर्घा में बैठे तालियां बजातें या घर में बड़े चाव से टीवी पर देखते लोगों को भी क्या उनकी बेशर्मी एवं तथाकथित आनंद लेने कि लिए उन्हें उनकी गलती की जिम्मेदारी अहसास नहीं होना चाहिए ?

बिग बॉस, राखी का इंसाफ, सच का सामना, इमोशनल अत्याचारए मीठी छुरी, कामेडी सर्कस जैसे मर्यादा लांघते तथाकथित रियल्टी शोज़ कतई एक परिवारिक मनोरंजक कार्यक्रम नहीं हो सकते क्योंकि मनोरंजन करना सर्वप्रथम एक कला हैं एवं कला जो कभी भी अशलील नहीं हो सकती 15-20 वर्षों पूर्व दूरदर्शन में प्रसारित होने वाले मनोरंजक कार्यक्र्रम बुनियाद, हमलोग, मालगुडी डेज़ एवं धार्मिक कार्यक्रम रामायणए, महाभारत भारतीय मनोंरजक मीडिया के सर्वाधिक लोकप्रिय ऐतिहासिक एवं अमर पारिवरिक मनोरंजक कार्यक्रमों की श्रेणी में उच्च कोटी का स्थान रखते हैं। वहीं आज मीडिया के चहुमुखी वं अप्रत्याशित विकास के बावजू़द ऐसे स्वच्छ मनोरंजक कार्यक्रमों की अपेक्षा बेमानी सिद्ध हो रही हैं जिसका एक मुख्य कारण दर्शकों का बदलता-बिगड़ता स्वाद एवं दोषपूर्ण रूचि भी हैं जिससे कतई इंकार नहीं जा सकता। किन्तु इन सब को तय करने में मीडिया की भूमिेका को भी नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता जिसे उसके सामाजिक दायित्वों का ज्ञान भली भांति है एवं अतिंम में कार्यक्रम तय करने का अधिकार भी कार्यक्रम बनाने वालों का ही हैं जो ये तय करते हैं कि वे अपने दर्शको को कैसे कार्यक्रम दिखना चाहेंगे ऐसे कार्यक्रम जिसे सपरिवार निसंकोच आम लोगो द्वारा देखा जा सके या फिर ऐसे दूषित कार्यक्रम जिस पर सांसद में हंगामा बरपाया जायें एवं सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा इस हेतु दिशा निर्देश तक जारी हो, भारतीय समाज में मीडिया का काफी प्रभाव हैं वैसे भी समाज को सही दिशा प्रदान करना एवं आम आदमी के विश्वास को बनाये रखना मीडिया का मूल कर्तव्य हैं इसलिए आम आदमी के हितों को बचायें रखना भी मीडिया की ही जिम्मेदारी हैं क्योंकि मीडिया का सरोकार आम आदमी के विश्वास से हैं।Azadi ka uphass

                                                     मीडिया की मंडी

नब्बे के दशक में शुरू हुई उदारीकरण की नीती से भारतीय मीडिया भी अछूता नही रहा । इसी का परिणाम है कि मात्र दो दशकों में ही भारतीय मीडिया एक सफल एंव वृहत उधोग का रूप ले चुका है। अब ये मात्र सामाजिक सरोकार की दृष्टि एंव नीती से कार्य नही करता। अपितु इसका उदेश्य भी अब व्यक्तिगत लाभ तक केंद्रित होता जा रहा है। पिछले कुछ सालो में आयी निजी टी0 वी0 चैनलों एंव एफ0 एम0 रेडियों की अप्रत्याशित बाढ ने इस क्षेत्र में निजी लोगों एंव संस्थानों का वर्चस्व इस हद तक बढ़ा दिया है कि अब ये लोग इसका प्रयोग अपने निजी स्वार्थ साधने के लिए भरपूर करते है। जिसमें अधिक से अधिक लाभ कमाना इनका मुख्य उ़द्धेश्य है। अनगिनत खबरिया एंव मनोंरजन चैनलों के अलावा लोगों की रूचि प्राईवेट एफ0एम0 चैनलों में भी दिखी है, जिसके फलस्वरूप मनोरंजन का साधन माना जाने वाला मीडिया अब एक गंभीर व्यापार का रूप लें चुका है। भारतीय मीडिया आज जिस व्यवसायिक गति से आगे बढ़ रहा है उसमें सबकुछ बिकने लगा हैं।

सूर्यग्रहण से लेकर चन्द्रग्रहण तक भूकंप से लेकर बाढ, तक आतंकवाद ,क्रिकेट, सिनेमा , आत्महत्या करते किसान ,तनावग्रस्त स्कूली बच्चें ,बेरोजगार किशोरो की खुदकुशी पर्यावरण एंव ग्लोबल वार्मिग के नाम पर अपने अस्तित्व की लड़ाई लडती मैली-जहरीली होती गंगा, जमुना हर पल घुलता हिमालय एंव फूहडता परोसते कथित रियल्टी शो तक।

कोई बताएं 24 घंटे न्यूज दिखाने के नाम पर चलने वाले इन न्यूज चैनलों से भी बडा रियल्टी शो कोई और हो सकता है क्या ?  इस बात को ये लोग भी अच्छी तरहा जानतें है कि 24 घंटे खबर दिखाना संभव नहीं है शायद इसलिए ही बीच-बीच में राजू के हसगुल्ले एंव सास बहू की साजिश दिखानी पड़ती है, जो कहीं से भी कोई खबर नही होती है।

बहरहाल इन्हें तो चाहिए मात्र एक प्रायोजक जो इनकी उट-पटांग खबरों को भी प्रायोजित कर सकें अर्थात व्यवसायिक कम्पनीया जो आम आदमी की खुशीयां-गम के बहाने अपना एंव अपने द्वारा उत्पादित सामानों का प्रचार प्रसार कर अपना व्यवसाय विस्तार कर सकें। हांलाकि किसा भी तरह के स्वच्छ व्यापार से किसी को भी कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। क्योंकि प्रत्येक व्यापार से कई घरों के चुल्हों की आग जुड़ी होती है। मीडिया उधोग भी उन्हीं में से एक है। लेकिन अधिक मुनाफा एंव टी0 आर0 पी0 की दौड, एंव स्वंय को न0 1 सिद्ध करने के लिए होने वाले समझौते घोर निराश जनक है। कथित स्टिंग ऑपरेशन एंव सनसनीखेज खबरे फैलाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने एंव खबरों को अपने तरीकों से तोड़-मरोड़ कर तैयार कर दर्शकों तक पहॅुचाने के लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया पहले ही अपनी लक्ष्मण रेखा लांघ कर स्वंय को कटघरें में खड़ा कर चुका है।

अखबारी पत्रकारिता में भी पेड न्यूज का जहरीला धंधा भी जोरो शोरो से जारी है। कई बड़े अखबार जहां अपनी लोकप्रियता की पूरी कीमत वसूलने में लगे है। वही छोटे एंव क्षेत्रिय अखबार भी पीछे नहीं है। साल 2009 के लोकसभा चुनाव एंव उसके बाद हुए महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में तो कई अखबारों पर अपनी विश्वसनीयता को भुनाने के लिए राजनीतिक दलों से उनकी रैलीयो जुलूसो एंव भाषाण इत्यादि को कवर करने एंव उन दलों का अपने अखबारों द्वारा महिमामंडन करने के लिए पेड पॉलिटिकल पैकेज तक बेचने का आरोप है। और इस बात की पुष्टी प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी की है। साथ में छोटें अखबारों का ये बयान कि हमारें पत्रकार जानतें है कि उन्हें कैसे कमाना है। घोर निराश एंव पत्रकारिता जगत को शर्मिदा करने वाला है।

मोटी होती मीडिया घरानों की बैलेंस शीट एंव पतला होता खबरों का स्तर इसी का परिणाम है। पत्रकारों एंव संपादको पर बढ़ता व्यवसायिक दबाव मीडिया में बढ़ते भ्रष्टाचार का घोतक है। वहीं टी0 आर0 पी0 टेलिविजन रैटिंग प्वाइंट का मापदंड अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। मसलन एक निजी विज्ञापन सर्वे कम्पनी टैम टेलिविजन आडियंस मैजरमेंट द्वारा भारत के चन्द बडें शहरों में लगाए गए लगभग 8000इलैक्ट्रोनिक मीटर पीप्लस मीटर कैसे भारत की लगभग 1करोड. 20लाख जनता की रूचि को तय कर सकते है? क्या ये गणना अपने आप में कोई मायने रखती है ? टी0 आर0 पी0 का मानक दिखाई जाने वाली खबरों का प्रभाव है या फिर उनकी एवज विज्ञापनों से होने वाली कमाई जिसके लिए आज का मीडिया किसी भी स्तर तक की सौदेबाजी के लिए तैयार मालूम पड़ता है, जो उनकी कार्यशैली एंव विश्वसनियता पर कई प्रश्न खड़े कर उसके दीर्घकालीन जीवन पर  प्रश्न चिह्र लगा उसे संकट में डाल सकता है ।

ऐसे अखबारों को न तो प्रेस परिषद, एडिटर्स गिल्ड, और न ही बुद्धिजीवीयों की चिंता है। और न ही मीडिया के लिए निर्धारित किसी कानून की। पिछले कुछ वर्षो में यह समस्या महामारी की तरहा फैली है। इसलिए कई जायज नजायज धंधा करने वालो ने अपना अखबार या चैनल शुरू कर लिया है ! जिसका मूल उद्वेश्य उनके नजायज धधों को सुरक्षा प्रदान करना, समाज एंव राजनीति के गलियारों में अपनी पैठ जमाना है। गौरतलब है कि ऐसे मीडिया घराने लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध हो सकते है।

अब आवश्यकता ऐसे मीडिया द्यरानों के सामाजिक बहिष्कार करने की है। जो अपनी ताकत का नजायज फायदा उठाते है या फिर उठाने की कोशिश करते है। अच्छी एंव बुरी खबर को तय करने की जिम्मेदारी अब आम पाठक एंव दर्शक को लेनी होगी। जो की यह तय करे की एक सर्तक सजग एंव सक्रिय समाचार मीडिया कैसा होना चाहिए। ऐसा जिसने रूचिका गिरहोत्रा को भारत के हर घर की बेटी बना दिया या फिर ऐसा जो आये दिन आपको पाखंडी बाबा , आत्मा चुडैल एंव पुर्नजन्म की कहानी सुना-सुना कर अंधविश्वासी बनाने में विश्वास रखता है। क्योंकि एक शक्तिशाली एंव स्वतंत्र  मीडिया ही हमारे समाज की दिशा एंव दशा निर्धारित करने में सहायक सिद्व हो सकता है।

By  Vikash Mishra

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