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फासले

Chandan Rathore Poem No.189

इन  मिलो  के  फासलों  को  कैसे  कम  करू
हो  रही  है  शाम  खुशियों  की  इस  शाम  को  कैसे  खुश  करू

ये  सारी  हवाएँ  आती  है  मेरी  ओर
मै  किस  किस  हवा  से  सामना  करूदेखता  हूँ  मै  जब  तेरी  सूरत  को
चला  जाता  हूँ  मै  मीलों  दूरसूरज  को  पकड़  ना  पाता  हूँ
पर  चाँद  से  दूरी  कैसे  कम  करू

छोड़  दिया  तुझे  भूल  भी  गया  तुझे
पर  तेरी  इन  यादों  को  कैसे  कम  करू

तुझे  माना  मेने  अपना  सब  कुछ
अब  तू  ही  तो  बता  तुझसे  फासला  कैसे  करू

By : Rathore Saab

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