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Bah Gai Khwahish ( बह गई ख्वाहिश)

Chandan Rathore Poem No.188

उमड़  गये  बादल
बरस  गई  बारिश
धूल  गए  अरमान
बह  गई  ख्वाहिश

स्वप्न  की  बेला  में
हर  दम  अकेला  में
दुःखों  की  सैया  पे
खुशियों  की  नुमाइश

धिक्कार  सा  जीवन
मन  चंचल  सा
रोज  नवीन  उत्पात  मचाता
नव  मन  क्रीड़ा  की  होती  यहाँ  फरमाइश

उछल-उछल  कर  दौड़ता  जाता
मन  इक  घोडा  है
एक  उपवन  में  ना  समाता
मन  शांत  करने  की  है  फरमाइश

उमड़  गये  बादल
बरस  गई  बारिश
धूल  गए  अरमान
बह  गई  ख्वाहिश

 

By : Rathore Saab

 

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