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Tuesday , 21 November 2017
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Roti Ki Laachari (रोटी की लाचारी)

roti ki lachari

छुप  रहे  अत्याचारी
खा  रही  रोटी  की  लाचारी
बंद  हुआ  अन्न  पानी
भूख  से  जनता  परेशान  बेचारी

धान  उगाता  देश  यहाँ
फिर  भी  इतना  महंगा  है
क्या  बयां  करू  चंद  शब्दों  में
किसानों  की  लाचारी

2  समय  के  खाने  को
कितना  तरसना  पड़ता  है
भाग  भाग  पूरा  दिन  काम  किया
फिर  रात  बिन  खायें  सोना  पड़ता  है

ये  देश  हुआ  परदेश  अब  तो
जहां  लोकतंत्र  की  मारा  मारी  है
गरीब  के  घर  में  रोटी  की  कितनी  लाचारी  है

2  बच्चे  खायें  1  पिता  खा  जाए
माँ  आज  भी  भूखी  सोती  है
देश  की  सरकार  का  क्या  कहुँ
आज  मेरी  धरती  माँ  ये  सब  देख  कर  रोती  है

भूख  सहन  करना  वो  क्या  जाने
जो  लोगो  के  धान  खा  जाते  है
इधर  बटाया  ध्यान
उधर  इंसान  नोच  लिए  जाते  है

भूख  का  क्या  कहना
वो  भी  तो  किस्मत  की  मारी  है
कैसी  आज  रोटी  की  लाचारी  है

कौन  कहे  कौन  सहे  सब  के  मुह  बाँध  दिए  जाते  है
ऐसी  भूख  है  आज  इंसान  इंसान  को  खा  जाते  है

खाने  को  तो  खा  रहे
घुस,  चारा,  अमर  शहीदो  की  जमीं  तक  को
भूखा  सोता  मेरा  देश
फिर  भी  खाना  पहुँचता  परदेश
खाने  के  लिए  यहाँ  तो  पेट्रोल  तक  पि  जाते  है

बिन  कहे  सब  कह  दूँ
देश  की  आवाज  भी  कह  दूँ
आज  हर  इंसान  की  ये  किलकारी  है
आज  हर  घर  में  रोटी  की  लाचारी  है

By: Rathore Saab

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