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Monday , 20 November 2017
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Saath Hote Tum (साथ होते तुम)

Chandan Rathore Poem No.206

ख़्वाबों  की  सीढ़ियों  में  कितनी  कशिश  है
महोबत  की  राहों  में  पता  नही  कितनी  बंदिश  है

अगर-मगर  इधर-उधर  बहता  हूँ  पानी  की  तरह
और  एक  महबूबा  के  इज़हार  की  आस  की  रंजिश  है

दीवाने  हो  मेरे  या  मुझको  बना  रहे  हो  दीवाना
प्यार  में  अपने  तुम्हारी  कसम  कितनी  सादिसे  है

हो  मेरे  या  फिर  हो  किसी  अनजान  के  जिंदगी  के  मांजी
सुन  तो  लो  महोबत  तुम्हारी  कितनी  बेखौफ  सी  है

रुक  ना  जाते  किसी  राह  पे  तो  साथ  होते  तुम
मेरे  हर  राज  के  राज  भी  होते  तुम
बोलता  मै  और  मेरी  आवाज  होते  तुम
कितने  हसीं  होते  वो  लम्हें  प्यार  के
जिन  लम्हें  में  साथ  होते  तुम

By: Rathore Saab

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