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Sunday , 22 October 2017
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Uski Izzat (उसकी इज़्ज़त)

Chandan Rathore Poem No.200

वो  अपनी  इज़्ज़त  आबरू  लिए  बिस्तर  पर  जम्हाइयाँ  ले  रही  थी
मै  उसके  पास  बैठ,  उसकी  आबरू  को  तक  रहा  था

वो  सिसक  सिसक  कर  अपनी  आहें  ले  रही  थी
और  मै  सिसक  सिसक  कर  उन  आहों  को  पि  रहा  था

खो  कर  सारे  अरमानों  के  पहाड़ों  को,  वो  रो  रही  थी
मै  उन  जज्बातों  को,  फिर  से  दिलाने  के  लिए  रो  रहा  था

नामी  शख्स  की  बदनामी  हजार  हुई  आज  वो  तार  तार  हो  रही  थी
उस  गुमनामी  जिंदगी  से  ये  बदनाम  जिंदगी  मिली  आज  मै  फिर  से  खो  रहा  था

बेखौफ  हुई  तार  तार  इज़्ज़त  मेरी,  मेरा  शरीर  उन  जालिमों  के  हाथ  लहूलुहान  हो  रहा  था
वो  सो  रही  आज  इज़्ज़त  आबरू  खो  कर  और  मै  उसके  पास  बैठकर  बस  रो  रहा  था

बस  रो  रहा  था…….    बस  रो  रहा  था  ……

 

Author: Rathore Saab

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