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Wednesday , 14 November 2018
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Meri Kahani Meri Jubani Part 3 (मेरी कहानी मेरी जुबानी भाग 3)

Chandan Rathore Poem No.211

लिखते  लिखिते  जिंदगी  और  आगे  बढ़ी
दुनियाँ  से  मुझे  और  ठोकरे  खानी  पड़ी

लिख  लिख  कर  बयां  करता  रहा  अपने  अरमानों  को
सुना  सुना  कर  बताता  रहा  अपने  जख्म  में  दुनियाँ  को

पर  अभी  भी  मंजिल  बहुत  दूर  थी
धीरे  धीरे  कविताएँ  आगे  बढ़ती  रही

काव्य  सुमन,  मौत-ऐ-कहानी
लिख  कर  सुना  दी  अपनी  कहानी
कविताओं  का  शतक  पूरा  हुआ
अभी  मुकाम  से  मेरा  सामना  ना  हुआ

और  एक  नौकरी  आई  उसने  मेरी  अभी  की  आजीविका  चलाई
कुछ  होता  नही  था  उन  पेसो  से  फिर  भी  मेने  उसे  अपनाई
कभी  पूरा  महीना  बिस्किट  से  निकल  जाता  तो  कभी  भूखा  ही  सो  जाता
हर  गम  को  ख़ुशी  से  जिया,  हिम्मत  ना  होती  तो  कभी  का  मर  जाता

कई  दोस्त  और  इस  राश्ते  मिले  जिन्होंने  मुझे  संभाला
मेरे  अपनों  ने  मुझे  मौत-ऐ-कहानी  का  भाग  2  लिखवा  डाला

बहुत  चर्चित  भी  थी,  बहुत  दुखद  भी  थी  ये  जिंदगानी
धीरे  धीरे  लेखकों  का  साथ  हुआ,  कुछ  सीखा  और  सुन्दर  हुई  लेखनी

डेढ़  सो  से  दो  सो  हुई  कविताएँ  अब  मेरी
कई  गाने  लिखे  कई  फ़साने  लिखे  सब  याद  थी  मेरी
मुकाम  ना  हुआ  हासिल  मेरे  शब्दों  को
नया  रूप  दिया,  नई  गहराई  भरी
फिर  भी  अकेला  पण  सताता  है
सब  से  अलग  रहने  को  जी  चाहता  है

जीवन  बहुत  कुछ  सिखा  रहा  था
आता  जाता  हर  शक्श  मुझे  समझा  रहा  था
पर  मेरे  सपने  बहुत  ही  उच्य  कोटि  के  थे
उन्हें  पूरा  करने  के  लिए  मै  सब  दम  लगा  रहा  था

पता  नही  कहा  ले  जायेगी  ये  कहानी  मेरी
और  कितनी  बाकी  है  दुःख  भरी  जिंदगानी  मेरी
एक  दिन  वो  अलग  हो  गया  जिसे  रूह  माना  था
ऎसे  रास्ते  पे  अलग  हुआ  जो  पता  नही  कहा  जाता  था

आज  भी  कोशिश  जारी  है
दुनिया  से  निपटने  की
बड़ी  सिद्दतों  से  तमन्ना  है
रो  रो  कर  जज्जबात  बताने  की

कभी  कई  मुकाम  आ  जाते  सामने
कभी  मुकाम  चुनना  कठिन  हो  जाता
समाज  सेवा  का  मन  किया  NGO  की  सोच  मन  में  आई
पर  पता  नही  क्यों  यहाँ  किसी  के  मन  को  ना  भाई

कहानी  फिर  अधूरी  रह  गई
आगे  फिर  कभी  सुनाऊंगा
आज  से  और  ऊपर  या  पता  नही  निचे  गिर  जाऊँगा
पर  हां  मेरी  कहानी  मेरी  जुबानी  (भाग  4)  आप  को  जरूर  बताऊंगा

By: Rathore Saab

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