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Monday , 20 August 2018
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शीश कटा कर के

Chandan Rathore Poem No.183
 
माँ  ने  भेजा  नत  मस्तक  तिलक  लगा  कर  के
बेटा  आता  है  अपना  शीश  कटा  कर  के

भेजा  था  उसे  सीमा  पे  पुष्प  माला  पहना  कर  के
आज  आया  है  सीमा  पे  जान  गवाँ  कर  के

खुशियाँ  थी  अपार  उसको  जब  गाड़ी  मे  बिठाया  था
आज  दुःखी  है  देश  सारा  जब  गाड़ी  से  उसे  उतरा  था

मन  प्रफुलित  था  जाते  वक्त  सीमा  पे
आज  एक  और  माँ  ने  बेटा  न्योछावर  किया  अपनी  धरती  माँ    पे

खुशियाँ  मनाता  दुश्मन  आज  जीत  का  जशन  मना  के
एक  और  बेटा  घर  आया  अपना  शीश  कटा  कर  के

आज  रो  रही  अर्धांगिनी  फूट-फूट  कर  अपना  सिंदूर  हटा  कर  के
सिसक-सिसक    के  रोये  पिता  अपने  हाथ    गवाँ  कर  के

मंझर  गमगीन  हुआ  सेना  में  मातम  छाया  है
दुखी  हुई  भारत  माँ  आज  फिर  अपना  एक  और  लाल  गवाँ  के

खुद  चढ़  गया  मौत  के  घाट  तुम  सब  को  बचा  कर  के
छोड़  गया  अपार  सन्देश  खुद  सीने  में  गोली  खा  कर  के

उठो  रे  जवानों  दुश्मन  को  पहचानों  बढे  चलो  हाथ  में  असला  बारूद  उठा  कर  के
ख़त्म  करो  उसको  जो  खुश  है  आज  एक  लाल  को  मौत  के  घाट  उतार  कर  के

खाली  ना  जाए  उस  माँ  की  दुआँ  जो  रो  रही  है  घर  के  चिराग  को  खो  कर  के
ख़त्म  करो  आतंक  को  जो  खुश  है  चंद  साँसे  संजो  कर  के

लाश  उठा  रहा  है  उस  बेटे  की  जिसे  काँधे  पे  कभी  खिलाया  था
कमजोर  हुआ  वो  पिता  अपने  कंधो  को  खो  कर  के

देश  की  आवाज  ये  कहती  है  कब  तक  बैठोगे  खामोश  होकर  के
अब  तो  जागो  एक  और  बेटा  आया  अपना  शीश  खो  कर  के

Poet: Rathore Sahab ( राठौड़ साब “वैराग्य” )

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