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नवजात शिशुओं के लिए एक और जरूरी चेकअप-स्पलिट स्पाइन डिफेक्ट

डॉ. सतनाम सिंह छाबड़ा, निदेशक, डिपार्टमेंट ऑफ न्युरोसर्जरी, सर गंगाराम अस्पताल
      स्पाइन बाइफिडा (स्पलिट स्पाइन) एक मस्तिष्क संबंधी विकार है, जिसमें रीढ़ की हड्डी और स्पाइन कार्ड के आसपास की झिल्ली पूरी बंद नहीं होती हैं। यह खराबी बच्चे की कमर के निचले भाग में होती है और दुर्लभ मामलों में, कमर के बीच वाले भाग या गर्दन में।
    बच्चा किस विकार के साथ जन्म लेगा, उसमें गर्भावस्था के दौरान मां का स्वास्थ्य कैसा है महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अनुवांशिक स्थितियों के अलावा, पर्यावर्णीय कारक भी स्पलिट स्पाइन का कारण बन सकते हैं। मां के शरीर में फॉलिक एसिड की कमी सबसे प्रमुख कारण में से एक है, इसीलिए गर्भवती महिलाओं को विटामिन बी के सप्लीमेंट लेने की सलाह दी जाती है।
न्युरल ट्यूब डिफेक्ट के प्रकार
     इसके आधार पर की रीढ़ की हड्डी कितनी बंद है, इस विकृति को मुख्यता दो भागों में बांटा जा सकता है।
स्पाइन बाइफिडा ओक्युल्टा
    यह स्पलिट स्पाइन का सबसे मामूली रूप है जहां कुछ कशेरूकाओं के बाहरी भाग पूरी तरह बंद नहीं होते हैं और स्पलिट इतना मामूली होता है कि इसमें से स्पाइनल कार्ड बाहर भी नहीं आती है। दूसरे प्रकारों के विपरीत, इसे स्क्रीन करना बहुत कठिन होता है और अधिकतर मामलों में इसके लक्षण भी दिखाई नहीं देते हैं। हालांकि अधिकतर लोगो में ओकुल्टा का डायग्नोसिस स्पाइनल एक्स-रे के दौरान संयोग से होता है, विश्व की 15 प्रतिशत जनसंख्या इसकी शिकार है।
स्पाइन बाइफिडा सिस्टिक
मेनिनगोसिल
     इसे पोस्टिरियर मेनिनगोसिल भी कहा जाता है, यह सबसे कम पाया जाता है, इसमें मेनिनजेस कशेरूकाओं के बीच से निकल जाता है। चूंकि तंत्रिका तंत्र को किसी भी प्रकार की क्षति नहीं होती है, लेकिन जो व्यक्ति इस प्रकार की विकृति से पीड़ित होता है उसे लंबे समय तक चलने वाली स्वास्थ्य समस्याएं हो जाती हैं।
मायेलोमेनिनगोसिल
   विकृति के इस प्रकार के रूप के परिणाम अक्सर गंभीर स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं के रूप में सामने आते हैं। इसमें कशेरूका के वो हिस्से जो पूरी तरह ढके नहीं हैं उनमें से स्पाइनल कार्ड बाहर निकल आती है। स्पाइनल कार्ड के इन बाहर निकले हुए भागों से लकवा मार सकता है और कमर के नीचे के भाग की संवेदनाएं खत्म हो सकती हैं। स्पाइनल कार्ड बाहर निकले हुए भागों के अलावा, दूसरे लक्षण जैसे संवेदना नष्ट हो जाना, नितंबों, घुटनों या पैरों में विकृति और मांसपेशियों की शक्तियों में कमी आ जाना सबसे अधिक देखे जा सकते हैं।
अगर इसका उपचार न कराया जाए तो क्या होगा?
    जो बच्चा इस विकृति से पीड़ित है अगर उसका उपचार न कराया जाए तो, उसे अपने आगे के जीवन में काफी स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इससे संबंधित समस्याओं में चलने की क्षमता प्रभावित होना, सीखने में समस्या आना, मूत्र व मल त्यागने पर निचंत्रण को लेकर समस्याएं होना और लेटेक्स एलर्जी सम्मिलित है।
     हाइड्रोसेफैलस एक दुर्लभ लेकिन संभावित स्थिति है जिसमें मस्तिष्क के भीतर सेरिब्रोस्पाइनल फ्ल्यूड (सीएसएफ) आसामान्य रूप से जमा हो जाता है। उम्र बढ़ने के साथ खोपड़ी के अंदर दबाव बढ़ने से सिर का आकार आसामान्य रूप से बड़ा हो सकता है, बार-बार सिरदर्द होना, दो-दो दिखाई देना और शरीर का संतुलन कम होना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
   इस विकृति से पीड़ित बच्चे जब बड़े होते हैं तब उनके व्यक्तित्व में परिवर्तन आ सकता है या मानसिक रूप से दुर्बल हो सकते हैं। अगर इसका उपचार न कराया जाए तो उल्टी होना, अनिद्रा, दौरे पड़ना जैसे लक्षण थोड़े-थोड़े अंतराल पर कुछ समय तक नियमित रूप से दिखाई दे सकते हैं।
डायग्नोसिस
    हालांकि ओकुल्टा के बारे में अल्ट्रासाउंड के दौरान कम ही पता चलता है, मायेलोमेनिनगोसेले सबसे गंभीर जटिलता है जिसमें स्पाइनल कार्ड बाहर निकल जाती है। दूसरी जांचों में एमनियोटिक फ्ल्यूड टेस्ट (एएफटी) जो एक मेडिकल प्रक्रिया है जो गर्भ में पल रहे बच्चे में क्रोमोसोमल गड़बड़ियों और संक्रमण का पता लगाने के लिए इस्तेमाल की जाती है। एएफपी (अल्फा फेटोप्रोटीन) के स्तर का निर्धारण करने के लिए किया जाता है, यह एक पदार्थ है जो गर्भ के लीवर में बनता है। मां के रक्त में एएफपी का उच्च स्तर स्पाइन में स्पिलिट की पुष्टि करेगा।
     आमतौर पर इस विकृति का पता गर्भावस्था के छठे सप्ताह में अल्ट्रा साउंड के दौरान लगता है। अगर किसी डॉक्टर (स्त्रीरोग विशेषज्ञ) को कोई उभार (जो गर्भावस्था के आठवें महीने में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है) दिखाई देता है, तब न्युरोसर्जन को दिखाने की राय दी जाती है ताकि जल्दी से जल्दी इसके बारे में जानकारियां ली जा सकें और समय रहते इसका उपचार कराया जा सके। जब इसके बारे में जल्दी पता चल जाता है तो मां को सलाह दी जाती कि विटामिन बी के सप्लीमेंट्स ले, क्योंकि बच्चे के जन्म से पहले सर्जरी कराना रिस्की हो सकता है।
समस्या का उपचार कैसे किया जाता है।
    विकृति की गंभीरता और मां के शरीर की स्थिति के आधार पर, केवल कुछ ही बच्चों में यह संभव हो पाता है कि जन्म के पहले इसे ठीक करने के लिए सर्जरी करा ली जाए।  अगर प्रसव सामान्य हुआ है, ऑपरेशन की जरूरत नहीं पड़ी है, बच्चे को न्योनैटल इन्टेन्सिव केअर यूनिट (एनआईसीयू) में रखा जाता है। सर्जरी करने से पहले अलग-अलग क्षेत्र के विशेषज्ञ डॉक्टर बच्चे की स्थिति की जांच करते हैं। इस सर्जरी के साथ तंत्रिकाएं और स्पाइनल कार्ड वापस कशेरूकाओं और स्पाइनल कॉलम की सभी परतों में रख दी जाती हैं और मांसपेशियों व त्वचा को रिपेयर कर दिया जाता है।
    आमतौर पर इस सर्जरी में 5-6 घंटे लग जाते हैं और सर्जरी पूरी होने तक बच्चे को वेंटीलेटर पर रखा जा सकता है, जब तककि वह एनेस्थिसिया से बाहर नहीं आ जाता और सामान्य रूप से सांस लेना शुरू नहीं कर देता। जब तक बच्चे को स्तनपान नहीं कराया जाता तब तक उसे आईवी के द्वारा पोषण दिया जा सकता है। अगर मस्तिष्क से अतिरिक्त तरल पदार्थों को निकालने के लिए दूसरी सर्जरी करने की आवश्यकता पड़ती है, इस स्थिति को वेंट्रीकल (जहां स्पाइनल प्ल्यूड मस्तिष्क में एकत्र हो जाता है) में एक नली लगाकर ठीक किया जा सकता है, और तरल को पेट में आने से रोका जाता है। सर्जरी के पश्चात पहली बार जागने के बाद बच्चे को मां के दूध द्वारा पोषित किया जा सकता है। बच्चों को किस स्थिति में रखना हे इसपर विशेष ध्यान दिया जाता है जब तक कि उसके घाव नहीं भर जाएं। डॉक्टर बच्चे को विशेष स्थिति में रखने और जहां सर्जरी हुई है वहां किसी प्रकार की कोई परेशानी होने से बचने के लिए स्पेशल पोजिशनिंग एड का सहारा लेने की सलाह भी दे सकते हैं।
सर्जरी के बाद का निरीक्षण और देखभाल
     डॉक्टरों को सीएसएफ की मात्रा पर नियंत्रण रखना पड़ता है, कम से कम चार सप्ताह तक, अल्ट्रा साअंड के इस्तेमाल द्वारा। यह सर्जरी तंत्रिकाओं और स्पाइनल कार्ड की किसी भी प्रकार के संक्रमण, मांसपेशियों की संवेदना से सुरक्षा करती है
कितनी व्यापक है यह विकृति
      लगभग 5 प्रतिशत नवजात शिशुओं में यह विकृति होती है, जो माना जाता है कि अनुवांशिक और पर्यावर्णीय कारकों दोनों के कारण होती है। दूसरे प्रसव में इसकी आशंका 4 प्रतिशत बढ़ जाती है। अगर पहला बच्चे में इसी प्रकार की स्थिति है या माता-पिता दोनों में से एक को विरासत में यह विकृति मिली है। भारत में प्रति दो हजार में से 2 बच्चे इस विकृति के साथ जन्म लेते हैं जो अमेरिका जैसे विकसित देश से बहुत अधिक है जहां यह आंकड़ा प्रति हजार 0.4 है।
    गर्भावस्था के दौरान या प्रसव के तुरंत बाद, स्पाइनल एक्स-रे और अल्ट्रा साउंड के द्वारा केवल 20 प्रतिशत मामलों का पता चल पाता है। भारत में लगभग 72 हजार मामले दर्ज हो चुके हैं। अगर सही समय पर इसका पता चल जाए और उपचार हो जाए तो, स्पाइना बाइफिडा से पीड़ित 90 प्रतिशत बच्चे व्यस्क होने पर सामान्य जीवन जी सकते हैं, 80 प्रतिशत की बौद्धिक क्षमता सामान्य होती है और 75 प्रतिशत विभिन्न खेल गतिविधियों में भाग ले सकते हैं।

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