Breaking News

आज जीना मुश्किल है

अमीरों  के  लिए  सविंधान  है
गरीबों  के  लिए  समशान  है
 
बेच  दिए  घर  के  बर्तन
फिर  भी  भूखे  सोते  है
हमारे  जलाने  को  लकड़ी  भी  नहीं
वो  मखमल  के  बिस्तर  पर  सोते  है
 
भेदभाव  इतना  है  की  खाना  मुश्किल  होता  है 
रोती  बिलखती  माँ  अब  ये  कहती  है
भूखे  बच्चों  को  सुलाना  मुश्किल  होता  है
 
मेहनत  कर  कुछ  कमा  के  लाते  है
एक  एक  रोटी  के  लिए  पुरे  जग  से  लड़ना  भिड़ना  पड़ता  है
होती  शांत  ना  उदर  पीड़ा  अब  इस  कलयुग  में
आज  मरना  आसान  और  जीना  मुश्किल  लगता  है
 
चिंतित  व्याकुल  पिता  रोता  है  चोरी-चोरी
माँ  सिसक-सिसक  कर  चूल्हें  में  अरमान  जलाती  है
ये  पीड़ा  है  बस  रोती  की  जो  हर
गड़ी  सहना  पड़ता  है
 
आज  गरीब  के  मुँह  में  निवाला  नही
अमीरों  के  घर  खाना  फिकता  है
उन  भूखे  बच्चों  को  आज  जीना  मुश्किल  लगता  है 
 
आपका  शुभचिंतक
लेखक  –    राठौड़  साब  “वैराग्य”  

About Team | NewsPatrolling

Comments are closed.

Scroll To Top