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Sambhal Naa Paata Hu (संभल ना पाता हूँ)

Chandan Rathore Poem No.224

एक  दुझे  को  समझने  को  रोज  चला  मै  आता  हूँ
देख  कर  मेरी  कमजोरी  मै  संभल  ना  पाता  हूँ

भूखा  उठता  हूँ  तेरे  प्यार  में  भूखा  सो  जाता  हूँ
नही  मै  आता,  नही  मै  जाता  फिर  भी  खो  जाता  हूँ

तेरे  प्यार  के  खातिर,  लोगों  के  दर्द  लिख  जाता  हूँ
लोग  जब  पढ़कर  रोते  है  तो  मै  सहम  सा  जाता  हूँ

आज  भी  तेरी  नामौजूदगी  में,  मै  पल  पल  मर  सा  जाता  हूँ
तू  कही  खुश,  में  तुझमे  खुश,  ख़ुशी  कहा  है,  मै  समझ  ना  पाता  हूँ

ऐ  प्यार  की  गलियाँ  उस  तक  पहुँचने  का  रास्ता  दिखा  दे
मै  उसके  बिना  आज  भी  गुम  हूँ  मै  उसके  बिना  आज  भी  गुम  हूँ

कमबख्त  मारा  उसके  प्यार  में  बेचारा  फिर  फिर  ढूंढ़ता  हूँ
तेरी  ख़ुदग़र्ज़ीयो  को  आज  भी  में  चुप  चाप  सह  जाता  हूँ

एक  दुझे  को  समजने  को  रोज  चला  मै  आता  हूँ
देख  कर  मेरी  कमजोरी  मै  सम्भलना  पाता  हूँ

By: Rathore Saab

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