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क्यूं है कोरोना काल में तनाव के प्रबंधन की विशेष आवश्यकता

तनाव। आज एक जाना पहचाना शब्द बन चुका है। आज अगर बच्चे से भी बात करो तो वह कहता है मुझे टेंशन मत दो मैं पहले ही तनाव में हूं| गीता में भी एक वर्णन आता है जब युद्ध का माहौल था -कौरव पांडव आपस में कुरुक्षेत्र के मैदान में लड़ने के लिए आमने सामने आते हैं। तब युद्ध में आने से पहले पराक्रमी धनुर्धर अर्जुन युद्ध जीतने के लिए उतावला था ।युद्ध क्षेत्र में आने के बाद अर्जुन ने श्री कृष्ण से कहा कि हे पार्थ मेरे रथ को युद्ध क्षेत्र में दोनों सेनाओं के मध्य में ले जाकर खड़ा कर दीजिए मैं देखना चाहता हूं कि दुर्बुद्धि कौरवों के पक्ष में कौन-कौन युद्ध लड़ रहा है और जब अर्जुन योद्धाओं को देखता है, तो पाता है कि उसके सामने उसके सभी रिश्तेदार उसके मामा चाचा ,ताऊ, गुरु पितामह ,दादा उसके सामने युद्ध लड़ने के लिए खड़े हैं। अर्जुन को एकदम अपने स्वजनों को देखकर उसके मन में मोह की उत्पत्ति हुई, और अर्जुन कहता है- मेरा मुंह सुख रहा है, मेरे हाथों में कंपन हो रही हैं ,धनुष मेरे हाथ से छूट कर नीचे छूट रहा है, मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा रहा है ,और वह धड़ाम से रथ में नीचे बैठ जाते हैं।

यह सारे लक्षण तनाव के ही थे। यानी जब गीता का उपदेश दिया गया था आज से 5000 साल पहले तनाव तब भी था, और तनाव बीच काल में भी था, तनाव आज भी है, और तनाव कल भी रहेगा। यह आपके ऊपर निर्भारी करता है कि आप किस तरह काम कर रहे हैं आप तनाव से कैसे निपटते हैं।

आज का युग अगर हम देखें तो करोना काल के समय में बहुत से लोग तनाव ग्रस्त हो गए हैं , लोगों के व्यापार पर असर पड़ा है, आज बहुत से लोग सुसाइड कर रहे हैं। इस समय हमें तनाव प्रबंधन की विशेष आवश्यकता है। तनाव को समझने के लिए पहले मन को समझना पड़ेगा क्योंकि इसका संबंध मन से है ।मन हमारी उद्यात्मिक इंद्री है। हमारी मुख्य रूप से दस इंद्रियां होती हैं -पांच ज्ञानेंद्रियां और पांच कर्मेंद्रियां.

पांच ज्ञानेंद्रियां है–आंखें ,नाक, कान ,त्वचा ,जिह्वा
पांच कर्मेंद्रियां है–वाणी,हाथ ,पैर ,पायु,उपस्थ,
और 11वीं इंद्री मन को बताया गया है | मन कर्मेंद्रियों के साथ मिलकर काम करता है, ज्ञानेंद्रियों के साथ मिलकर भी काम करता है , और जब हम तनाव लेते हैं तो मन उसमें विषय होता है। पहले मन को समझना है।

जब व्यक्ति का मन पर नियंत्रण नहीं होता ,तो उसका विचारों पर भी नियंत्रण नहीं होता। जब विचारों पर नियंत्रण नहीं होता तो हारमोंस पर भी नियंत्रण नहीं होता। और जब हारमोंस पर वह नियंत्रण नहीं होता, तो अपने इंद्रियों पर भी वह अपना नियंत्रण खो देता है। जब मन का रोग होता है ।यानी कि मेंटल डिसऑर्डर्स बहुत सारे शारीरिक लक्षण भी दिखाई देते हैं। यानी अगर आपको मानसिक बीमारी है तो शारीरिक बीमारी भी लगने के चांस बढ़ जाते हैं। इनको साइकोसोमेटिक डिसीज भी कहते हैं। मतलब वह मन में उत्पन्न हुआ और मन में उत्पन्न होने से ,शरीर में उत्पन्न होने लगा। मनोकयिक रोग होने का खतरा बढ़ जाता है। मधुमेह, ब्लड प्रेशर रक्तचाप ,सर्वाइकल, थायराइड एग्जिमा ,मोटापा यह सब मनोकायिक एक रोग है।

खिन्नता, चिड़चिड़ापन यह सब तनाव के ही लक्षण है! चिंता , डिप्रेशन – यह सब तनाव के साथ फ्री में आते है यह तनाव की सहयोगी बीमारियां हैं ।जब आप किसी चीज का दबाव लेते हैं, तो वह तनाव कहलाता है ।जैसे किसी प्रतिस्पर्धा या दबाव में कोई काम करें तो शरीर में चिंता के हार्मोन कारटीसोल का सिक्रेशन होता है। जिससे हमारा पाचन तंत्र धीमा हो जाता है ।और फिर बहुत सी बीमारियों को जन्म देता है। और इसके अलावा कॉर्टिसोल का सीधा प्रभाव t-lymphocytes पर पड़ता है। जिससे श्वेत रक्त कोशिकायें (WBC) में टी लिंफोसाइट्स की मात्रा कम होने से शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है।

तनाव के प्रबंधन के लिए हमें अपने मन पर नियंत्रण करना होगा। गीता से लेकर हठ प्रदीपिका ,योगदर्शन ,घेरंड संहिता सभी ग्रंथों में मन की महत्वता को बताया गया है। मन को नियंत्रण करने के लिए सबसे पहले प्राणों पर नियंत्रण करना पड़ेगा, और प्राणों पर नियंत्रण करने के लिए शरीर को साधना पड़ेगा। हमें आसन प्राणायाम का अभ्यास करना होगा|

तनाव ग्रस्त व्यक्ति का आकर्षण वयस्नो की तरफ बढ़ने लगता है। और फिर तनाव बढ़ता ही चला जाता है ।और वह अपने ऊपर नियंत्रण खो देता है। गीता के अनुसार यदि आप अपने व्यवहार के अनुसार अपने काम का चयन करें ,तो आपको तनाव नहीं घेरेगा। गीता का सार बताता है ‘स्वभाव करमणे’सहज कर्म स्वभाव से उत्पन्न होता है। आप स्वभाविक कर्म करें। गीता को तनाव प्रबंधन का ग्रंथ भी माना जाता है। गीता में बार-बार मन की चंचलता की बात कही गई है। श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं अर्जुन मन को स्थिर करो।अर्जुन कहते हैं जितना मैं प्रयास कर रहा हूं ,मन उतनी ही तेज गति से भाग रहा है। वहां पर योगेश्वर श्रीकृष्ण एक उपाय फिर बताते हैं कि निश्चित रूप से हमारा मन बलवान है वह बार-बार भागता है इसको हम अभ्यास और वैराग्य के द्वारा नियंत्रण में कर सकते हैं
आज कारपोरेट लाइफ में सब तनाव में है क्योंकि वहां पर अनावश्यक प्रतिस्पर्धाहै। तनाव को दूर करने के लिए आप अपना स्वाभाविक बेस्ट दें। होड़ में ना आए। वरना तनाव कई तरह की बीमारियां देगा।। हमें क्वालिटी टाइम स्पेंड करना चाहिए जो आपके चाहने वाले हैं उनके साथ समय बिताएं। नेगेटिव लोगों से कम मिले। तनाव भी दो प्रकार का होता है। अच्छा तनाव जिसे हम तनाव कहते हैं और बूरा तनाव जिसे हम वी तनाव कहते हैं!

पहाड़ पर चढ़ना एक व्यक्ति के लिए तनाव युक्त हो सकता है परंतु दूसरे व्यक्ति के लिए वही आनंददायक हो सकता है। इसलिए अपनी पसंद का काम करें। और अच्छे खाद्य पदार्थ खाएं। चाह गई चिंता मिटी मनवा बेपरवाह जिसको कछु न चाहिए सोई शहंशाह।

व्यक्ति शायद अपनी इच्छाओं के अधीन में रहता है तो वह भी तनाव का एक बड़ा कारण है तृप्ति का भाव आते ही तनाव दूर हो जाता है।
योग में भी ईश्वर प्राणी धान की बात की गई है। सब कुछ परमात्मा के चरणों में समर्पित कर दो कोई भी समस्या हो उसका समाधान उस परमात्मा के पास अवश्य ही होता है हमें लगता है। कि सभी समस्याओं का समाधान हमने स्वयं करना है लेकिन ऐसा नहीं है जब हम स्वयं को परमात्मा मानने लगते हैं तो तनाव भी बढ़ने लगता है ।हमें हमारे भीतर जो परमात्मा है उसको अपना सब कुछ समर्पित कर देना चाहिए। कई बारी हमें लगता है ,कि हमें हमारे कर्मों का फल हमारे मुताबिक नहीं मिल रहा ,हमारा यह काम नहीं हो रहा है ।लेकिन कुछ समय बीत जाने के बाद हमें कई बारी एहसास भी होता है, कि अगर यह काम ऐसे हो गया होता तो उसका मुझे नुकसान होता। तो उस परमात्मा से बड़ी इस दुनिया में कोई चीज नहीं है जैसे बच्चे को उसके अच्छे बुरे का नहीं पता होता है इसी तरह से हमें भी अपने अच्छे बुरे का ज्ञान नहीं होता है तो परमात्मा अगर हमारे काम में अड़चन डालता है तो इसका मतलब यह है ,कि वह हमारे लिए अच्छा नहीं है हमें कोई दूसरा रास्ता चुनना चाहिए या हमें उसके ऊपर और मेहनत करनी चाहिए अभी हमारी मेहनत पूर्ण नहीं है।

By Yoga Instructor Ranjana Chhabra, Founder of Vinyasa Yoga Studio

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